अपने मामले में बहुत ज़्यादा सजदे करके मेरी मदद करो।

ह़ज़रत आबू फिरास रबीआ़ बिन कअ़ब असलमी जो अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम के ख़ादिम और सुफ़्फ़ा वालों में से हैं वह कहते हैं मैं (ख़िदमत के लिए) अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम के साथ रात गुजारता था। (जब आप सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम तहज्जुद के लिए उठते तो) मैं वुज़ू का पानी और दूसरी जरूरी चीज़ें लेकर आप की खिदमत में हाजिर होता। एक बार आप सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम ने मुझसे फरमाया: "(जो चाहो) मांगो।" तो मैंने कहा: "मैं आपसे यह चाहता हूँ कि जन्नत में भी आपका साथ मिले।" आप सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम वसल्लम ने फ़रमाया: " इसके अलावा कुछ और?" मैंने कहा: " बस यही " तो आप सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया: " तुम अपने मामले में बहुत ज़्यादा सजदे करके मेरी मदद करो।"

जो भी नबी ए करीम सल्लल्लाहु अ़लैहि सल्लम की खिदमत करता या आपके साथ कोई भलाई करता तो आप सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम उसे उससे ज़्यादा देते। उस पर आप खास तवज्जो फरमाते। उसको अपने पास रखते। और अपने पास आने-बैठने की दौलत से नवाज़ते। अगर उससे कुछ गलती हो जाती तो माफ फरमा देते। और अच्छा काम करने पर उसकी तारीफ करते। यह केवल इस वजह से नहीं करते कि वह आप की खिदमत करता था बल्कि आप सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम का ऐसा करना आपके लिए उसकी बेपनाह मोहब्बत, अल्लाह तआ़ला की  फरमांबरदारी, आप सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम और आपके घर वालों के साथ उसके अदब से पेश आने और इनके अलावा बहुत सी दूसरी खुसूसियतों और खूबियों और दूसरे सह़ाबा ए किराम से हटकर उसकी अच्छी विशेषताओं पर उसके लिए आप सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम की तरफ से यह नज़राना और तोहफा होता था।

नबी ए करीम सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम लोगों के दर्जों और स्थानों को समझ जाते थे। लिहाज़ा हर शख्स को उसके मुनासिब दर्जा और हैसियत देते। और हर तरह से हकदार को उसका हक देते यहाँ तक कि किसी को भी यह शिकायत नहीं होती कि किसी तरह से उसकी उसका हक मारा गया है या उसके सम्मान में कमी हुई है।

आप सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम के ख़ादिम रबीअ़ह बिन कअ़ब आपकी खिदमत के लिए आप ही के पास रात गुजारते थे। एक दिन आप सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम ने उन्हें अपने पास बिठाकर इरशाद फ़रमाया: " जो चाहो मुझसे मांग लो।" उन सह़ाबी को यह पूरा यकीन था कि मैं जो भी नबी ए करीम सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम से मांग लूंगा तो अल्लाह के हुक्म से आप वह जरूर मुझे देंगें। और नबी ए करीम सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम भी यह जानते थे कि आपका ख़ादिम कोई दुनियावी (सांसारिक) चीज नहीं मांगेगा क्योंकि उसे दुनिया में कोई दिलचस्पी नहीं है और अगर कोई दुनियावी चीज़ मांग भी ले तो वह अल्लाह की रजा़ ही के लिए होगी। तो अल्लाह की रजा़ के लिए कोई चीज़ मांगे तो अल्लाह पाक आप सल्लल्लाहु वसल्लम की दुआ़ से उसे चीज़ जरूर पूरा करेगा जैसे कि उसने क़ुरआन मजीद में इसका वादा किया है। आप सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम के उस अकलमंद खादिम ने आपसे ऐसी चीज़ मांगी जो सबसे अच्छी चीज़ है और वह जन्नत है। जी हाँ जन्नत सबसे अच्छी चीज़ है। उससे अच्छा कुछ भी नहीं है। और ऐसा क्यों ना हो जबकि वहाँ अल्लाह की बेपनाह रहमतें और नेमतें हैं। और उसमें सिर्फ वही शख्स जाएगा जिससे अल्लाह मोहब्बत करता हो और जिससे वह राजी़ और खुश हो। तो क्या जन्नत से बढ़कर भी कोई और चीज़ हो सकती है?

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