(अल्लाह की मर्ज़ी के बिना) कोई बीमारी उड़कर नहीं लगती।

ह़ज़रत अबू हुरैरा कहते हैं कि मैंने अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम को फरमाते हुए सुना:" (अल्लाह की मर्ज़ी के बिना) कोई बीमारी उड़कर नहीं लगती, और अपशकुनी, उल्लू और सफर के महीने का मनहूस (दुर्भाग्य) होना कोई चीज नहीं है। और कोड़ी से ऐसे भागो जैसे शेर से भागते हो।"

नबी ए करीम सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम को अच्छे अखलाक सिखाने और उन्हें पूरा करने और लोगों के बीच मशहूर सही़ह़ आदतों और रस्मों व रिवाजों का समर्थन करने और बुरी आदतों और रस्मों व रिवाजों को खत्म करने के लिए भेजा गया था। नबी ए करीम सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम ने अरबों और गैर अरबों की विरासत में प्राप्त उन झूठी खुराफातों को खत्म करने में कोई कसर नहीं छोड़ी जो उनमें बाप दादाओं से चली आ रही थीं और वे उन्हें ठीक समझते थे। उन्हीं खुराफातों में से अपशुकन लेना उल्लू और सफर के महीने को मनहू़स समझना भी हैं।

अपशकुन लेना यानी बुरा शकुन लेना। इसको अरबी भाषा में "त़ियरह" कहते हैं। यह अरबी शब्द तत़य्यरह अल- त़ैरु" से लिया गया है जिसके माना है परिंदा उड़ाना। अरब के लोग किसी काम के करने से पहले परिंदे को उड़ा कर उससे शकुन लेते थे परिंदे के दाएं तरफ उड़ने से अच्छा शकुन लेते और उस काम को करते और बाएं तरफ उड़ने से और कौवों के काएं काएं करने के बुरा शकुन लेते और उस काम को करने से रुक जाते।

ह़दीस़ पाक में शब्द "हाम्मह "आया है। इसका का मतलब है उल्लू का मनहूस समझना। और कहा जाता है कि अरब के लोगों मानना था कि जब किसी आदमी की हत्या कर दी जाती है तो उस की हडि्डयाँ हामा नामी पक्षी बन कर उड़तीं और चिल्लाती रहती हैं यहाँ तक कि उस का बदला ले लिया जाये। कुछ लोगों का मानना यह था कि यह उस की आत्मा ही है।

और शब्द " सफर" के बारे में विद्वानों की कई रायें हैं। कुछ कहते हैं कि इसका मतलब सफर का महीना है। क्योंकि अरब के लोग सफर के महीने को मनहूस समझते थे। जबकि कुछ दूसरे लोग कहते हैं कि इससे मुराद वह सांप है जो इंसान के पेट में होता है जब इंसान को भूख लगती है तो यह सांप कहता है: मुझे खिलाओ मुझे खिलाओ।

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