केवल अल्लाह की कसम खाया करो और अल्लाह की कसम उसी सूरत में खाओ जब तुम सच्चे हो।

ह़ज़रत अबू हुरैरा रद़ियल्लाहु अ़न्हु बयान करते हैं कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया: अपने पिताओं या मांओं की कसमें ना खाया करो और ना बुतों की। केवल अल्लाह की कसम खाया करो और अल्लाह की कसम उसी सूरत में खाओ जब तुम सच्चे हो।"

इस्लाम से पहले जाहिली जमाने में अरब के लोग अपने बापों, मांओं और बुतों की बहुत ज्यादा कसमें खाया करते थे। तो नबी ए करीम सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम ने उन्हें इससे मना किया। क्योंकि इसमें अल्लाह के अलावा को सम्मान देना है। और यह (यानी अल्लाह के अलावा किसी और को सम्मान देना) किसी भी ऐसे व्यक्ति को शोभा नहीं देता जो अल्लाह पर ईमान रखता हो, केवल उसी की इबादत करता हो और अपने दिल में उसकी महानता रखता हो। क्योंकि जिसने अल्लाह को उसके बेहतरीन नामों और बुलंद विशेषताओं के साथ पहचान लिया तो वह उससे अपने मां-बाप बल्कि खुद बल्कि खुद अपनी जान से ज्यादा मोहब्बत करेगा और उसे सारी कायनात में केवल उसी अल्लाह ही नजर आएगा तो अगर उसे कसम खाने की जरूरत होगी तो वह केवल अल्लाह की ही कसम खाएगा।

जो व्यक्ति अल्लाह के अलावा किसी चीज की कसम खाए और यह आस्था रखे कि उस चीज का भी अल्लाह ही जैसा सम्मान है तो यकीनन उस चीज की कसम हराम है और कसम खाने वाला व्यक्ति अपनी उस आस्था की वजह से काफिर हो जाएगा।

और जो अल्लाह के अलावा किसी चीज की कसम खाए लेकिन यह आस्था न रखे तो उसकी कसम मकरुह(नपसंदीदा) है लेकिन अगर दिल के इरादे के बगैर ही मुंह से ऐसी कसम निकल गई तो कसम बेकार है और उसका कोई माना नहीं है।

तो जब मुसलमान सिर्फ अल्लाह ही की बढ़ाई करता है तो वह -जरूरत के समय- सिर्फ अल्लाह ही की कसम खाए और उसकी बारगाह के अदब और उसकी महानता का ख्याल रखे। क्योंकि सिर्फ अल्लाह ही उस व्यक्ति को उस पर लगाए गए आरोप या इल्जाम से बरी कर सकता है। तो भला वह क्यों अल्लाह के अलावा किसी की कसम खाए जब के अल्लाह ही के कब्जे में सारा मामला है।

नबी ए करीम सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम के फरमान "और अल्लाह की कसम उसी सूरत में खाओ जब तुम सच्चे हो।" का मतलब यह है कि ज्यादा कसम मत खाओ और सिर्फ सच्ची ही कसम खाओ। इसकी वजह यह है कि कुछ लोग बहुत ज्यादा कसम खाते हैं। और अहम और बिना हम सभी मामलों में अक्सर कसम खाया करते हैं। और इसकी परवाह नहीं करते हैं कि अल्लाह ने अपने क़ुरआन की निम्नलिखित आयत में इससे मना किया है। अतः अल्लाह क़ुरआन में इरशाद फ़रमाता है:

(तर्जुमा: और अल्लाह को अपनी कसमों का निशाना ना बना लो कि एहसान और परहेज़गारी और लोगों में समझौता करने की कसम कर लो। और अल्लाह सुनता जानता है।)

(सूरह:अल-बक़रह, आयत संख्या:224)

क्योंकि बहुत ज्यादा कसमें खाने से इंसान ज्यादातर अपना वकार खो बैठता है। और फिर वह ऐसे अहम मामलों में भी लापरवाही बरतने लगता है जिनमें बिल्कुल लापरवाही नहीं बरतना चाहिए जैसे की गवाही देने, वादा पूरा करने वगैरह मामलों में।

और मुसलमान की शान तो यह है कि वह अपनी हर बात, हर काम और अपने हर हाल में अपने अल्लाह के साथ, दूसरों के साथ बल्कि अपने भी साथ हमेशा सच्चा रहता है।

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