जहन्नुम की आग से बचो भले ही खजूर के एक टुकड़े ही के जरिए।

ह़ज़रत अ़दी बिन ह़ातिम से उल्लेख है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अ़लैहि ने जहन्नुम का ज़िक्र किया तो उससे पनाह मांगी और चेहरा से नापसंदगी का इज़हार किया, वह कहते हैं कि ऐसा  तीन बार किया, फिर आप सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम ने फरमाया: "जहन्नुम की आग से बचो भले ही खजूर के एक टुकड़े ही (के सदका़ देने) के जरिए हो और अगर यह भी नहीं कर सकते तो अच्छी बात करके ही (बचो)।"

नबी ए करीम सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम अपने सह़ाबा ए किराम रद़ियल्लाहु अ़न्हुम को नसीहत करते और उन्हें तमाम कामों के अंजाम की खबर देते रहते जैसा कि उन्हें जन्नत का शोक़ दिलाते और जहन्नम से डराते रहते थे। और यह उस वक्त करते जब सह़बा अपने और दुनिया के कामों से खाली होतो। कभी-कभार तो आप सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम की नसीहत सुनकर सहा़बा रद़ियल्लाहु अ़न्हुम अल्लाह के खौफ व डर से रो पड़ते और आप सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम भी उनके साथ रोते, क्योंकि आप सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम के दिल में सबसे ज्यादा अल्लाह का खौफ व डर था। कभी-कभार तो कुछ सह़ाबा को आप सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम की नसीहत सुनते समय ऐसा लगता था कि यह आप सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम की जिंदगी की आखरी नसीहत है।

अत: एक दिन नबी ए करीम सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम ने जहन्नुम की आग का ज़िक्र किया तो आपने उससे पनाह मांगी हालांकि आप सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम उसकी बुराई से महफूज़ हैं। ज़रा सोचिए कि हमारा क्या हाल होगा जबकि हमें चारों तरफ से गुनाहों ने गहरे गहरे रखा है और हमारे पास नेकियाँ भी नहीं है जो हमें उसकी तपिश और सख्ती से बचा सकें।

ह़दीस़ शरीफ के आखिरी हिस्से का मतलब यह है कि अगर तुम से कंजूसी - जोके जहन्नुम में ले जाने वाली है- या किसी और वजह से यह भी ना हो सके कि तुम खजूर का टुकड़ा भी किसी को देखकर अपने आप को जहन्नुम की आग से बचा सको तो अच्छी बात करके ही अपने आप को जहन्नुम की आग से बचा लो, क्योंकि अच्छी बात भी तुम्हें अल्लाह से नजदीक करने और उसके अ़ज़ाब से बचाने का जरिया है। अतः अल्लाह तआ़ला ने कुरान ए मजीद में इरशाद फरमाया:

अच्छी बात कहना और माफ करना उस है खैरात से बेहतर है जिसके बाद सताना हो और अल्लाह बे नियाज़ बर्दाश्त करने वाला है।

 

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