तुम में से जब कोई शख्स अपनी मस्जिद में (फर्ज़ यानी अनिवार्य) नमाज़ पढ़ ले तो अपनी नमाज़ का कुछ हिस्सा (यानी सुन्नत और नफ्ल) अपने घर में भी अदा करे।

ह़ज़रत जाबिर बिन अ़ब्दुल्लाह रद़ियल्लाहु अ़न्हु कहते हैं कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम ने फ़रमाया: "तुम में से जब कोई शख्स अपनी मस्जिद में (फर्ज़ यानी अनिवार्य) नमाज़ पढ़ ले तो अपनी नमाज़ का कुछ हिस्सा (यानी सुन्नत और नफ्ल) अपने घर में भी अदा करे। क्योंकि अल्लाह तआ़ला उसकी नमाज़ से उसके घर में बेहतरी करेगा।"

नमाज़ धर्म का महत्वपूर्ण सुतून और स्तंभ है। जिसने उसे बाकी़ रखा उसने धर्म का बाकी़ रखा और जिसने उसे ढा दिया उसने धर्म को ढा दिया। यह उन लोगों के लिए साफ़ प्रकाश और रोशन दलील है जिन्होंने इसे विनम्रता और श्रद्धा के साथ उसके नियत समय पर अदा किया। उसमें फ़र्ज़, सुन्नत और मुस्तह़ब चीज़ों का ख्याल रखा और उसे अपनी आत्मा और जान बना लिया।

नमाज़ बंदे और उस के अल्लाह के बीच एक मज़बूत रिश्ता और संबंध है जिसमें बंदा पूरी तरह से अपनी पूरी बंदगी और अपने अल्लाह के दरबार में अपनी पूरी मोहताजी का इज़हार करता है। नमाज़ जैसी ऐसी कोई इ़बादत नहीं जिसमें बंदा अपनी कमज़ोरी और मोहताजी का इज़हार कर सके। क्योंकि इसमें वह अपना माथा और अपनी नाक ज़मीन पर रख देता है भले ही समाज में उसकी कुछ भी हैसियत हो, लोगों में कितना ही ऊंचा उसका स्थान हो और कितनी ही वह ताकत का मालिक हो।

उस नमाज़ से मुराद जिसे मुसलमान मस्जिद में पढ़े फर्ज़ और उससे संबंधित उसके बाद और पहले की (सुन्नत और नफ्ल) नमाज़ें हैं। (लिहाज़ा इसका मतलब यह है कि अपने घर दूसरी नफ्ल नमाज़ें पढ़े। और यह भी कहा गया है कि इससे मुराद केवल फर्ज़ नमाज़ है। जिसका मतलब यह है की सुन्नतें और नफ्ल नमाज़ें अपने घर पढ़े और फर्ज़ नमाज़ें मस्जिद में। और यही ज़्यादा मुनासिब है। लेकिन हाँ अगर घर में सुन्नत और नफ्ल नमाज़ें पढ़ने से लोग उस पर उंगलियां उठाएं, उसे बुरा समझें और कहें कि यह व्यक्ति सुन्नत है और नफ्ल नमाज़ें छोड़ता है तो ऐसी सूरत में वह सुन्नत और नफ्ल नमाज़ें मस्जिद ही में पढ़े ताकि लोग उसके बारे में बुरा गुमान करने से बचें।) और ख्याल रहे कि जब कोई ऐसे समय के अलावा में मस्जिद में आए जिसमें (नफ्ल) नमाज़ पढ़ना मना है तो उसे मस्जिद में आने की दो रकात नमाज़ भी पढ़ लेना चाहिए।

याद रहे कि फर्ज़ (अनिवार्य) नमाज़ को जमाअ़त के साथ पढ़ना ज़रूरी है। और बिना किसी सख्त शरई़ कारण और ज़रूरत के उसे छोड़ना जायज़ नहीं है। बिना किसी कारण के जमाअ़त वही शख्स छोड़ता है जो मुनाफिक़ हो या जिसका इमान कमजो़र हो।

ह़दीस़ शरीफ में आता है कि जो भी अच्छी तरह वुज करके मस्जिद की तरफ रवाना होता है तो उसके हर कदम के बदले एक नेकी लिखी जाती है। उसका एक दर्जा बढ़ा दिया जाता है। और उसका एक गुनाह मिटा दिया जाता है। और ह़दीस़ की मशहूर किताब सही़ह़ मुस्लिम में ह़ज़रत अ़ब्दुल्लाह बिन मसऊ़द रद़ियल्लाहु अ़न्हु जमाअ़त की अहमियत बयान करते हुए फरमाते हैं: "मैंने देखा कि हम लोगों की यह हालत थी कि जमाअ़त की नमाज़ से सिर्फ वही मुनाफिक पीछे रहता था जिसका निफ़ाक सबको मालूम होता था। और मैंनें देखा कि (बीमार) आदमी दो आदमियों के सहारे लाया जाता था यहाँ तक कि उसे सफ़ में खड़ा कर दिया जाता।"

घरों में नमाज़ पढ़ने के फायदों में से यह भी है कि रोज़ी- रोटी में बरकत होती है। फरिश्ते नमाज़ के समय वहाँ आते हैं। घर वालों के लिए दुआ़ करते हैं। और जो कुछ नमाज़ में पढ़ा जाता है उसे सुनते हैं। वे घर अल्लाह के नूर से रोशन होते हैं। अल्लाह के ज़िक्र से आबाद रहते हैं। मस्जिद जैसी उनकी पवित्रता हो जाती है। इनके अलावा और भी दूसरे फायदे हैं जिन्हें हम जानते हैं या नहीं जानते।

लिहाज़ा जो भी नबी ए करीम सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम की इस वसियत पर अमल करेगा तो उसे दुनिया और आखिरत में बड़ी भलाई और बरकत हासिल होगी। वह सच्चा मुसलमान बन जाएगा, मस्जिद का भी हक़ अदा करेगा और घर का भी और घरों को जिंदा करने और उन्हें अल्लाह के ज़िक्र से आबाद करने में अपने घरवालों और पड़ोसियों के लिए एक आदर्श हो जाएगा। और नबी ए करीम सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम की जिंदगी हम सब के लिए एक बेहतरीन आदर्श है।

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