ह़दीस़ शरीफ में उल्लेखित वसीयत का मुख्तसर (यानी संक्षिप्त) माना यह है कि तुम जिंदगी भर अपने अल्लाह से अच्छी उम्मीद करो यहाँ तक कि तुम अपनी इसी उम्मीद के अल्लाह करीम से जा मिलो। क्योंकि जो जिस हालत पर मरेगा वह उसी पर उठाया जाएगा। लिहाज़ा अल्लाह की रहमत और कृपा से ऐसे ही उम्मीद और ख्वाहिश रखो जैसे कि तुम अपनी जिंदगी की ख्वाहिश रखते हो। उस अल्लाह करीम की रह़मत और कृपा से अच्छी उम्मीद की हालत में ही तुम्हें मौत आए। और उसकी रह़मत और कृपा से मायूसी व निराशा और गफलत की हालत में तुम्हें मौत ना आए। लिहाज़ा जब जब भी तुम्हें अपने अंदर मायूसी और निराशा की कुछ निशानिया़ नजर आएं तो तुम फौरन अपने अल्लाह की रह़मत और कृपा को याद कर लो। और याद रखो कि अल्लाह की रह़मत और कृपा हर चीज़ को घेरे हुए है। उसकी मगफ़िरत और क्षमा उसके उसकी सज़ा और उसके अ़ज़ाब से पहले है। और उसका अपने बंदों की तौबा कुबूल करना दिल की नस से भी ज़्यादा नज़दीक है