सत्य एक है (2 का भाग 1)

धर्म की चर्चा करते समय अक्सर यह सुनने को मिलता है कि किसी को भी किसी और के विश्वासों को आंकने का अधिकार नहीं है, या धर्म व्यक्ति का निजी मामला है और हम इसे गलत या सही नहीं कह सकते। पूरे इतिहास में, समाजों ने अपने कानूनों और नैतिकता को "पूर्ण सत्य" पर आधारित किया है, जिसे वे "सही" मानते हैं, और यह या तो एक बाहरी पाठ का परिणाम है जिसे सर्वोच्च माना जाता है, या मनुष्यों की जन्मजात प्रकृति में पाए जाने वाले गुण का परिणाम है जिससे उन्हें कुछ चीज़ें अच्छी और कुछ चीज़ें बुरी लगती हैं। मनुष्य एक सीमित पैमाने पर कुछ चीजों को अच्छा और बुरा देखता है। उदाहरण के लिए, सभी मनुष्य बिना मन की विकृति के अपनी प्राकृतिक अवस्था में छोड़ दिए गए मल और मूत्र को गंदगी के रूप में देखते हैं। और चोरी, हत्या और झूठ जैसे कामों को बुरा माना जाता है, जबकि सत्य, ईमानदारी और सम्मान को अच्छा माना जाता है। यह एक गुण का परिणाम है जो सभी मनुष्यों में बनाया गया है, लेकिन जैसा कि ऊपर बताया गया है यह भावना सीमित है।

यदि कोई कहता है कि उन्हें दूसरे के विश्वासों या कार्यों को आंकने का अधिकार नहीं है, तो वे वास्तव में स्वयं का खंडन करते हैं। यदि आप इनमें से कई लोगों से पूछें कि क्या बच्चो को मारना या आत्महत्या करना सही है, तो वे स्वाभाविक रूप से उत्तर देंगे कि ये सही नहीं है। लेकिन हम कुछ समाजों को देखते हैं, जैसे कि मध्य अमेरिका में पाए जाने वाले कुछ धर्म, जिसमें बच्चो की हत्या को अपने देवताओं के करीब आने का एक तरीका माना जाता था। साथ ही आज भी हिंदू धर्म में पति की मृत्यु के बाद पत्नी का अपने आप को मारना प्रशंसनीय माना जाता है। यदि वे वास्तव में मानते हैं कि धर्म व्यक्ति का निजी मामला है और किसी को भी उसको आंकने या उसमे हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं है, तो इसके लिए उन्हें बच्चो को मारने की अनुमति देनी होगी जो इसे सही और प्रशंसनीय मानते हैं, और लोगों को उन्हें आंकने का कोई अधिकार नही है।

यदि हम इस मुद्दे को एक व्यक्तिगत स्तर पर लाते हैं, तो हम देखेंगे कि प्रत्येक व्यक्ति की अच्छाई और बुराई की अपनी व्यक्तिगत धारणा है, चाहे यह धारणा धर्म, कानून, संस्कृति या व्यक्तिगत विचार पर आधारित हो। कोई यह मान सकता है कि व्यभिचार करना पूरी तरह से सही है जबकि दूसरा इसे गलत मान सकता है। कोई यह मान सकता है कि उनके लिए नशीले पदार्थों का सेवन सही है क्योंकि यह उनका अपना शरीर है, और अन्य लोग इसे अपराध मान सकते हैं। कोई भी यह नहीं कह सकता कि क्या सही है या क्या गलत है, और सभी लोगों को उनके ऊपर छोड़ दिया जाएगा कि वह वो करें जिसे वे "सही" मानते हैं।

यदि हम समाज में इस विश्वास को लागू करते तो हमारा समुदाय अराजकता पर आधारित होता, जहां न तो कोई कानून बनाया जा सकता और न ही उसे क्रियान्वित किया जा सकता, क्योंकि कानून इस सिद्धांत पर आधारित है कि कुछ चीजें सही हैं और कुछ बुरी। यदि कोई यह कहे कि कुछ ऐसे सत्य हैं जिन पर सभी मनुष्य सहमत हैं और जिनका उपयोग कानून बनाने के लिए किया जा सकता है, तो यह एक निश्चित सीमा तक सही है, क्योंकि जैसा कि हमने कहा कि सभी मनुष्यों में स्वाभाविक रूप से सही और गलत जानने का एक गुण होता है। लेकिन ऐसा देखा गया है कि यह गुण कई बार पर्यावरण, मनोवैज्ञानिक या धार्मिक कारणों की वजह से विकृत हो जाता है, जिसमें कुछ कार्य जो एक समय में बुरे और अनैतिक थे, बाद में उन्हें अच्छे और स्वीकार्य माने जाते हैं, और कुछ चीजें जो मानव स्वभाव के अनुरूप नहीं हैं, उन्हें मोक्ष की कुंजी माना जाता है। यह लोकतांत्रिक समाजों में स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है जिनके कानून बहुमत पर आधारित होते हैं। हम देखते हैं कि बहुत सी चीजें जिन्हें पूरी तरह बेतुका या अनैतिक माना जाता था, अब सामाजिक रूप से इसे इस हद तक स्वीकार्य माना जाता है कि अगर कोई इस मुद्दे के संबंध में एक अलग राय रखता है तो उसे बहिष्कृत कर दिया जाता है।

इसी वजह से मनुष्यों को उनके ऊपर नहीं छोड़ा जा सकता की वो फैसला करे की क्या सही है और क्या गलत है। यहां तक कि एक ही धर्म के समाजों में जिन्होंने धर्म और राज्य के अलग नियम बनाये हैं, यद्यपि वे उन बातों से सहमत हैं जो उन्होंने अपने धर्म से सीखी है, लेकिन इस संबंध में वे बहुत अलग हैं कि उनके समाज में क्या सही है और क्या गलत है। फ्रांस में संभोग करने की जो कानूनी उम्र है उसे अमेरिका में बलात्कार माना जाता है। जहां एक देश में गर्भपात कानूनी है, वहीं दूसरे में यह अपराध है, और जहां समलैंगिकता को एक समाज में वैध माना जाता है वहीं इसे दूसरे समाज में एक गंभीर पाप माना जाता है।

इसलिए यदि अब हम कहें कि सत्य निरपेक्ष और एक है, और किसी व्यक्ति और समाज से संबंधित नहीं है, तो अगला प्रश्न यह है कि वे कौन सी नैतिकता हैं जो सत्य को बताती हैं और उसका निर्णय कौन लेता है? ऐसे कौन से कानून हैं जिन्हें समाज में लागू किया जाना चाहिए? क्या उन्हें वकीलों और न्यायाधीशों द्वारा तय किया जाना चाहिए जो "कानूनी ज्ञान" के एक स्तर तक पहुंच चुके हैं, क्या उन्हें राजनेता द्वारा तय किया जाना चाहिए जो आमतौर पर अपने फायदे के लिए या अपने देश के फायदे के लिए निर्णय लेते हैं, या दार्शनिकों द्वारा तय किया जाना चाहिए जो अपने स्वयं के चिंतन के माध्यम से सार्वभौमिक सत्य को जानते हैं? जैसा कि पहले देखा गया है, मनुष्यों को इन मुद्दों को तय करने के लिए नहीं छोड़ा जा सकता, कहीं ऐसा न हो कि परिणाम भयावह हों, जैसा कि आज देखा जा सकता है कि कई समाजों में कई बुराइयां है। सही और गलत का कानून बनाने का अधिकार केवल उसी को है जिसने हमें बनाया है और जानता है कि हमारे लिए सबसे अच्छा क्या है, और वह सर्वशक्तिमान ईश्वर है। यह ईश्वर ही है जिसने दुनिया को बनाया है और यह ईश्वर ही है जिसने न्याय के नियमों को निर्धारित किया है। वह ईश्वर ही है जो पूर्ण है और वह ईश्वर ही है जिसमें कोई दोष नहीं है।

हमारी अधिकांश चर्चा विश्वास के मुद्दों से संबंधित है जो नैतिकता और कर्मों से संबंधित है, लेकिन इससे भी अधिक महत्वपूर्ण वो विश्वास हैं जो ईश्वर से संबंधित हैं, और इस पर चर्चा अगले लेख में की जाएगी।

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