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नबी सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम की ह़दीस़ शरीफ से हमें यह सीख मिलती है कि सुहागरात को पत्नी अगर माहवारी की स्थिति में हो तो पति सम्भोग व सेक्स(योनि में प्रवेश) को छोड़कर उसके साथ हर तरह से मज़ा ले सकता है।

आइये इस बारे में अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम की वसियत पढ़ते हैं, आप सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया: " एक-निकाह (सम्भोग) को छोड़कर आप जो चाहते हैं वह सब करें।" और एक दुसरी रिवायत में है: " निकाह़ (सम्भोग )को छोड़कर हर चीज़ करो। "()

यहाँ पर निकाह का अर्थ है सम्भोग करना। (यानी उसके विशेष भाग में प्रवेश करना)

मुसलमानों की मां ह़ज़रत आ़एशा - रद़ीयल्लाहु अ़न्हा - कहती हैं: "हम (यानी नबी सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम की पत्तियों) में से जब कोई माहवारी की स्थिति में होता था और अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम मुबाशरत करना (यानी बदन से बदन मिलाकर पास होना) चाहते तो माहवारी में सलवार (या उस जैसा कोई कपड़ा) पहनने का आदेश देते और फिर बदन से बदन मिलाते। "()

इस तरह से हम देखते हैं कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम ने माहवारी में केवल सम्भोग को छोड़कर कर हर चीज़ करने की इजाज़त व अनुमति दी है। और यह इस्लाम द्वारा दी गई आसानी व सरलता है, क्योंकि यहूदी माहवारी के दौरान महिला को बिल्कुल अलग रखते थे। न तो उसके साथ रहते और न ही उसके साथ खाते पीते थे। जैसे कि वह एक अपराधी हो।

लेकिन जब इस्लाम अपनी रोशनी लेकर आया तो उसने मुसलमानों (बल्कि सारे लोगों) के लिए आसानी करदी। तो सभी भलाईयाँ इसी के तरीके में हैं और सारी आसानियाँ इसी के रास्ते में हैं।

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([1]) दोनों ह़दीस़ों के संदर्भ: यह ह़दीस़ सही़ह़ है, मुस्लिम (302), अबु दाऊद (258), अह़मद (2/132/246), तिरमिज़ी (2977), निसई (1/152), इब्ने माजह (644), दारमी (1/254), इब्ने हि़ब्बान (1362), बग़वी की किताब " शरह़ुस्सुन्नह" में (314) और बइहक़ी की किताब “ सुनने कुबरा ” (1/313)

([2]) यह ह़दीस़ सही़ह़ है, बुखारी (302), मुस्लिम (293), अबु दाऊद (270), तिरमिज़ी (132), निसई (1/151), इब्ने माजह (635) ,अ़बदुर्रज़्ज़ाक़ (1237), दारमी (1/244) औ बग़वी (317) इसकी तख़रीज की है।

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