अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अ़लैहि व सल्लम) ने हमें भाषण देते हुए फ़रमाया: ऐ लोगों! अल्लाह ने तुम पर ह़ज अनिवार्य (फ़र्ज़) कर दिया है, अतः तुम ह़ज करो, तो एक व्यक्ति ने कहा : ऐ अल्लाह के रसूल! क्या हर साल ह़ज अनिवार्य (फ़र्ज़) है? तो आप (अल्लाह के रसूल सल्लल्ललाहु अ़लैहि वसल्लम ) खामोश रहे, यहाँ तक कि उस व्यक्ति ने तीन बार वही बात कही, अतः अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अ़लैहि व सल्लम) ने फ़रमाया : अगर मैं " हाँ " कह देता तो तुम पर वह (यानी ह़ज हर साल) अनिवार्य व अवश्य हो जाता, और तुम (हर साल) ना कर पाते, फिर आप (सल्लल्लाहु अ़लैहि व सल्लम) ने फ़रमाया : जो मैं तुम्हें बता दूँ उससे ज़्यादा ना पूछो, क्योंकि तुम से पहले वाले लोग अपने नबियों से असहमति और बहुत ज़्यादा सवाल करने के कारण ही नष्ट हुए थे, अतः जब मैं तुम्हें किसी चीज़ को करने के आदेश दूं तो जहां तक हो सके उसे करो, और जब मैं तुम्हें किसी चीज़ से मना करूं तो तूम उसे छोड़ दो (और उस चीज़ के क़रीब भी ना जाओ ) "।