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ह़ज़रत जाबिर बिन अ़ब्दुल्लाह रद़ियल्लाहु अ़न्हु कहते हैं कि मस्जिद के आसपास कुछ जगहें खाली हुईं तो (क़बीला) बनू सलमह ने इरादा किया कि वे मस्जिद के पास आ जाएं। यह बात अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम तक पहुंची तो आप ने उनसे इरशाद फ़रमाया: " मुझे यह खबर पहुंची है कि तुम मस्जिद के क़रीब आना चाहते हो।" उन्होंने कहा: "जी हाँ, ए अल्लाह के रसूल! हम हक़ीक़त में यह इरादा कर चुके हैं।" तो अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया: " ए बनू सलमह! अपने उन्हीं घरों में रहो। तुम्हारे कदमों के निशान लिखे जाते हैं। अपने उन्हीं घरों में रहो। तुम्हारे कदमों के निशान लिखे जाते हैं।"

जब नबी ए करीम सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम हिजरत करके मदीने तशरीफ लाए और मस्जिद बनाई तो मुहाजरीन आपके पास आ गए और आपके नजदीक ही उन्होंने अपने घर बना लिए और बहुत से अंसारी सह़ाबा भी ऐसा ही करने लगे ताकि नबी ए करीम सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम के पड़ोस में रहें, आपके साथ पांचो वक़्तों की नमाज़ें पढ़ें, आपके चेहरे की ज़ियारत से आनंद हासिल करें, आपसे अपने धर्म की बातें भी सीखें और मस्जिद के पास भी रहें।

लिहाज़ा जब मस्जिद के पास कुछ जगहें खाली हुई हैं तो बनू सलमह ने चाहा कि वे अपने घर उन खाली जगहों में बना लें। क्योंकि उनके घर से मस्जिद से बहुत दूर थे। नबी ए करीम सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम को इसकी खबर पहुंची। नबी ए करीम सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम यह चाहते थे कि ये जगहें खाली रहें ताकि मुसलमान जंग का अभ्यास करने और कैदियों को रखने वगैरह दूसरे कामों में उन जगहों से फायदा उठाएं।

लिहाजा नबी ए करीम सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम ने उनसे इरशाद फ़रमाया: " मुझे यह खबर पहुंची है कि तुम मस्जिद के पास (खाली जगहों में) आना चाहते हो। " ताकि उनके बारे में नबी ए करीम को जो खबर पहुंची थी उसकी तस्दीक हो जाए और उन्हें उसकी तरफ रहनुमाई फरमाएं जो उन्हें इस मामले में करना चाहिए।

तो बनू सलमह ने कहा: "हाँ, ए अल्लाह के रसूल! हम वास्तव में यह इरादा कर चुके हैं। " चुनांचे उन्होंने अपनी बात यानी इरादे को शब्द " क़द" (वास्तव में कर चुके ) के साथ रखा जो पक्का इरादे का माना बताने के लिए आता है। यानी वे अपने इस इरादे के पूरा होने के इंतजार में थे जैसा कि क़ुआरान मजीद की निम्नलिखित आयत में है:

 " बेशक अल्लाह ने सुनी उसकी बात जो तुमसे अपने पति के मामले में बहस करती है और अल्लाह से शिकायत करती है। "

(सूरह: अल-मुजादलह, आयत संख्या: 11)

क्योंकि वह औरत इस बात के इंतजार में थी कि अल्लाह उसकी शिकायत को सुने और फैसला फरमाए।

और जैसा कि मौअज़्ज़िन इक़ामत के समय कहता है: क़द क़ामत अल-सलातु " यानी जिस नमाज़ के तुम इंतजार में थे वह खड़ी हो चुकी है।

चुनांचे नबी ए करीम सल्लल्लाहु अ़लैहि सल्लम ने उनसे इरशाद फ़रमाया: ऐ बनू सलमह! अपने उन्हीं घरों में रहो। और वहाँ से यहाँ घर मत बनाओ। क्योंकि मस्जिद की तरफ चलकर आने वाले तुम्हारे कदमों के निशानों को अल्लाह ताआ़ला लिखता है। (और उनके हिसाब से तुम्हें बदला अता फरमाए गा) लिहाज़ा यह खुशखबरी सुनकर बनू सलमह बहुत खुश हुए और इस बात पर उन्होंने अल्लाह का शुक्र अदा किया कि उन्होंने अपने घरों को नहीं छोड़ा और वहाँ से मस्जिद के पास ना आए जैसा कि इमाम मुस्लिम की एक दूसरी रिवायत में है कि उन्होंने कहा: " हमें मस्जिद के पास आने से खुशी नहीं होती।"

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