जब तुम में से कोई दुआ़ करे तो (अल्लाह से) यक़ीन के साथ मांगे।

ह़ज़रत अनस रद़ियल्लाहु अ़न्हु कहते हैं कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया: जब तुम में से कोई दुआ़ करे तो (अल्लाह से) यक़ीन के साथ मांगे और यह ना कहे: ए अल्लाह! अगर तू चाहे तो मुझे देदे, क्योंकि अल्लाह पर कोई ज़बरदस्ती करने वाला नहीं है।"

हर मुसलमान अच्छी तरह से यह जानता है कि सारी मख़लूक़ और चीज़ अल्लाह ताआ़ला की मर्ज़ी और उसकी कु़दरत के तहत है। उनमें उसी का हुक्म चलता है। वह जो चाहता है होता है और जो नहीं चाहता नहीं होता है। उसके फैसले को कोई रद्द नहीं कर सकता और ना ही उसके हुक्म को कोई टाल सकता है। सभी उसके मोहताज हैं और वह किसी का मोहताज नहीं। लोग अगर उसकी बात मानें तो उसे कुछ फायदा नहीं होता और ना ही उसे उनके बात ना मानने से कुछ नुकसान होता है। लिहाज़ा जब ऐसा मामला है तो बंदे को चाहिए कि वह सुबह व शाम छुपकर और खुलेआम गिड़ गिड़ाकर उसकी बारगाह में दुआ़ करता रहे और उससे उसकी कृपा, दया, रह़मत और माफी की भीख मांगता रहे पूरे इस यकी़न के साथ कि वह अपनी रह़मत से मेरी दुआ़ ज़रूर क़बूल करेगा। क्योंकि अल्लाह ऐसे व्यक्ति की दुआ को रद्द नहीं करता जो उससे गिड़ गिड़ाकर और पूरी ईमानदारी के साथ दुआ़ करें जबकि वह ह़लाल व जायज़ खाता पीता हो और जायज़ पहनता हो, उसके ईमान में मायूसी और निराशा ना हो और उसकी दुआ़ अदब के खिलाफ तरीके से ना हो और ना ही अपनी दुआ़ यानी मांग में हद से बड़े।

यह ह़दीस़ शरीफ मुसलमानों को इस बात की हिदायत देती है कि जब अल्लाह से दुआ़ करें तो पूरे यकी़न के साथ करें। और अपने अल्लाह का हुक्म मानने में अपनी तरफ से कोई कोताही करने या कोई गुनाह करने या किसी और वजह से दुआ़एं करने में हिचकिचाहट या शाक व संदेह से काम न लें। क्योंकि अल्लाह करीम अपने बंदों पर खुद उनसे ज्यादा मेहरबान व दयालु है और उसकी दया व महरबानी और कृपा हर चीज़ को घेरे हुए है।

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