और लोग तक़वा (अल्लाह से डरने) में तरह तरह के होते हैं जैसे कि वे क्षमताओं और योग्यताओं में तरह तरह के होते हैं, तो कुछ लोग तो बस मुसतह़ब (पंसद आने वाला) कार्य करने और नाजायज़ और मकरूह (पंसद ना आने वाला ) कार्य से बचते हैं, और कुछ लोग जायज़ चीज़ों को भी छोड़ देते हैं इस डर से कि कहीं किसी नाजायज़ और ह़राम चीज़ में ना पड़ जाएं, और कुछ लोग दुनिया ही से बेपरवाह हो जाते हैं और केवल जीवन के लिए अवश्य चीज़ों को लेते हैं, और तक़वा इन सभी को शामिल है।