तू (मेरे रास्ते में) खर्च कर मैं तुझ पर खर्च करूंगा।

ह़ज़रत अबू हुरैरा रद़ियल्लाहु अ़न्हु कहते हैं कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम ने फ़रमाया कि अल्लाह ताआ़ला इरशाद फरमाता है:"ए आदम के बेटे! तू (मेरे रास्ते में) खर्च कर मैं तुझ पर खर्च करूंगा।"

इस ह़दीस़ का मतलब बिल्कुल स्पष्ट और साफ़ ज़ाहिर है। लेकिन इसमें कुछ बारीकियाँ है जो हम आपसे बयान करना चाहते हैं ताकि आप हमारे साथ उन सब या कुछ में गौर और फिक्र करें और उनके मानों और मक़सदों से फायदा उठाएं।

(1) अल्लाह ताआ़ला का फरमान: "तू खुर्च कर।" यह एक आदेश है। लिहाज़ा जिन कामों में खर्च करना ज़रूरी है जैसे के ज़कात देना, बीवी बच्चों पर खर्च करना, माता पिता और जो उनके स्थान में हैं जैसे दादा दादी पर खर्च करना और मोहताज भाई और बहन पर खर्च करना जिनकी कोई देखभाल करने वाला ना हो। तो उन कामों में यह आदेश वुजूब यानी जरूरत को चाहता है। और जहाँ खर्च करना मुस्तह़ब यानी बेहतर हो तो वहाँ यह आदेश इस्तेह़बाब यानी बेहतरी को चाहता है जैसे कि गरीब, फकीर और मिस्कीन और उन जैसे दूसरे मोहताज लोगों को सदका़ और खैरात देना खासकर जब जरूरतमंद और मोहताज लोग कोई रिश्तेदार या पड़ोसी या कोई दोस्त या तालिबे इल्म या कोई और नेक व्यक्ति हो।

(2) "तु खर्च कर" इसका मतलब है अपने माल में से सखा़वत और खुले दिल के साथ खर्च करो।

अत: मुसलमान उसी समय सखी यानी दाता कहा जाता है जबकि वह बहुत ज़्यादा सदक़े और खैरात निकाले और अल्लाह के रास्ते में खुशी खुशी खर्च करे। क्योंकि वह अल्लाह के अ़जा़ब से उसी समय बच सकता है जबकि वे कंजूसी और लालच जैसी बुरी आफतों से दूर रहे, दुनिया को अहमियत ना दे, उसकी ख्वाहिश दिल से निकाल दे और सिर्फ और सिर्फ उन्हीं नेमतों की ख्वाहिश करे जो अल्लाह के यहाँ हैं।

और मेरे प्यारे इस्लामी भाइयों! जो भी तुम कोई ऐसी चीज खर्च करोगे जिसमें लोगों का फायदा हो तो अल्लाह ताआ़ला तुम्हें दुनिया और आखिरत में उसका बेहतर बदला देगा। क्योंकि अल्लाह बहुत ज़्यादा फज़्ल करने वाला और देने वाला है। उसकी अ़ताई कभी खत्म नहीं होती। वह अपने बंदों को बिन मांगे देता है। और जो उस पर विश्वास रखता और ईमान लाता है और उसके रास्ते में खर्च करता है उसकी दौलत में बरकत फरमाता है।

याद रखें कि इस दुनिया में जितने भी लोग आए और कयामत तक जितने भी आएंगे उनमें सबसे ज्यादा सखावत करने वाले और सबसे बड़े दाता हमारे पैगंबर मुह़म्मद सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम हैं। आपका हाथ हवाओं की तरह था। जिस तरफ भी जाते बांटते चले जाते थे। अपने से दुसरों को पहले रखते, मेहमान की मेहमान नवाजी करने, जरूरतमंद की मदद और उसकी ज़रूरत पूरी करने, भूखे को खाना खाना खिलाने और कर्ज़दारों का कर्ज़ा अदा करने में कोई कसर नहीं छोड़ते जैसा कि हम सभी को ये चीज़ें आप सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम की सीरत पाक और ज़िंदगी के बारे में पढ़ने से अच्छी तरह मालूम हैं।

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