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ह़ज़रत अबु सअ़द अल ख़ुदरी -अल्लाह उनसे राज़ी हो- से रिवायत है वह कहते हैं कि मैंने अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अ़लैहि व सल्लम) को यह कहते हुए सुना:

"तुम में से जो भी बुराई को देखे तो वह उसे अपने हाथ से बदले (यानी रोके), अगर (हाथ से) नहीं कर सकता तो ज़बान से, अगर (ज़बान से भी) नहीं कर सकता तो अपने दिल में उसे बुरा समझे और यह ईमान का सबसे कम दर्जा है।

यह ह़दीस़ शरीफ फि़कह के अधिक अध्यायों व बाबों में मुख्याधार व मैन पिलर है। और फुक़ाहा ने इसमें बड़े शोध और बह़स़े लिखी हैं, जिनमें उन्होंने बहुत मसले बयान किए हैं, भलाई व अच्छाई का आदेश देने और बुराई से रोकने के हुक्म, और उसके तरीके,और जिससे यह संबंधित है, और उसकी क्या शर्तें हैं, और कोन सी ऐसी हालतें व स्तिथियां हैं जिनमें यह महान कर्तव्य (भलाई व अच्छाई का आदेश देना और बुराई से रोकना) छोड़ा जा सकता है और केवल दिल में ही बुरा समझना काफी होगा, और इनके अलावा दुसरे आदाब और अह़काम के बारे में बहुत ज़्यादा इखतिलाफ बयान किया है।

    इस ह़दीस़ को सामान्य रूप से अगर दखा जाए तो इसमें हमें पता चलता है कि इस्लाम एक ऐसा धर्म है जिसने अच्छाई व भलाई को नैतिकता व एख़लाक और आदर्शों का पहला सिद्धांत व नियम बनाया है, अतः इस्लाम उसे (अच्छाई व भलाई) करने का सख़्ती से आदेश दिया, और उसके करने की योग्यता व ताक़त होने के बावजूद उसे छोड़ने से चेतावनी दी, और उसका आदेश देने को ऐसे व्यक्ति पर जो उसका योग्य है ज़रूरी कर दिया।

भलाई व अच्छाई हर वह चीज़ है जिसका इस्लाम ने आदेश दिया या उसको पंसद किया है। और उसका विलोम बुराई है, और वह हर वह चीज़ है जिसे इस्लाम ने पंसद नहीं किया है , उससे मना किया है और उससे चेतावनी दी है। जैसे किसी अनिवार्य व वाजिब को छोड़ना या कोई नाजायज़ व ह़राम काम करना।

 

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