हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो- का अपनी पत्नियों के बीच बराबरी करना
पैगंबरहज़रतमुहम्मद-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो- अपनी पत्नियों के साथ बिल्कुल इनसाफ से चलते थे , और जैसा कि उल्लेख किया जा चुका है कि वह बहुत प्यार वाले , सहनशील, वफादार और माफ़ करने वाले थे, वास्तव में उनका इंसाफ उनकी जिम्मेदारी की भावना से उत्पन्न हो रहा था और क्योंकि अल्लाह सर्वशक्तिमान ने उन्हें इंसाफपसंदी और हक़ पर पैदा किया था और इन दोनों बातों के साथ उन्हें लोगों की तरफ भेजाl
१- हज़रत आइशा-अल्लाह उनसे प्रसन्न रहे- कहती हैं :" ऐ मेरे भांजे! अल्लाह के पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-बारी में या ठहरने में हमारे बीच एक दूसरे के साथ नाइंसाफी नहीं करते थे, और बहुत ही कम ऐसा होता था कि हम सब का चक्कर नहीं लगाते थे और बिना छूए के (बिनामैथुनकिए) प्रत्येक पत्नी के नज़दीक जाते थे और अंत में उस पत्नी के घर पर आते थे जिनकी बारी होती थी और फिर उनके यहाँ रात बिताते थेlसौदा बिनते ज़मआ कहती हैं कि जब उनकी उम्र हो गई और उनको डर लगा कि कहीं पैगंबरहज़रतमुहम्मद-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-उनसे अलग न हो जाएं तो उन्होंने हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-को कहा: ऐ अल्लाह के पैगंबर! मेरी बारी आइशा को देती हूँ, तोहज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-ने इस बात को स्वीकार कर लियाl
वह कहती हैं कि इसी और इस तरह की समस्याओं के बारे में यह आयत उतरी:
)यदि किसी स्त्री को अपने पति की ओर से दुव्र्यवहार या बेरुखी का भय
हो l) यह हदीसहज़रत आइशा-अल्लाह उनसे प्रसन्न रहे-से कथित हैl
और यह हदीस विश्वसनीय है, इसे अबू-दावूद ने उल्लेख किया है lदेखिए 'सुनन अबू-दावूद' पृष्ठ नम्बर या संख्या २१३५l
२-वह सदा इनसाफ और बराबरी के पाबंद रहते थे, और यात्रा के बावजूद भी अपनी पत्नियों के बीच इनसाफ में कोई प्रभाव नहीं पड़ता था और जिस तरह वह अपने घर पर रहते हुए इनसाफ करते थे उसी तरह यात्रा पर रहने की स्तिथि में भी इनसाफ करते lहज़रत आइशा-अल्लाह उनसे प्रसन्न रहे- कहती हैं कि हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-जब यात्रा करने का इरादा करते थे तो अपनी पत्नियों के बीच चुनाव करते थे (या सिक्का उछालने की तरह का कोई काम करते थे ) और जिनका नाम निकलता था उनको साथ लेते थे, और प्रत्येक पत्नी के लिए रात और दिन में भाग देते थे लेकिन सौदा बिनते ज़मआ ने अपने दिन और रात हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-की पत्नी हज़रत आइशा-अल्लाह उनसे प्रसन्न रहे-को दे दी थी, वास्तव में वह हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-की खुशी चाहती थीl
यह हदीस हज़रत आइशा-अल्लाह उनसे प्रसन्न रहे-के द्वारा कथित की गई , और यह हदीस सही है, इसे इमाम बुखारी ने उल्लेख किया है, देखिए बुखारी शरीफ पेज नंबर या संख्या: २५९३l
मतलब जब वह बड़ी उम्र की हो गई थी और उनको मर्दों की इच्छा नहीं रही थी तो उन्होंने अपनी बारी हज़रत आइशा-अल्लाह उनसे प्रसन्न रहे- को दे दी थीं l
३-हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-के अपनी पत्नियों के साथ इनसाफ का एक उदाहरण यह भी है कि जब वह किसी गैर कुंवारी महिला से विवाह करते थे तो उनका दिल रखने के लिए उनके साथ तीन रातों के लिए रहा करते थे, उसके बाद उनके लिए भी सारी पत्नियों की तरह ही बारी बाँध देते थे l
जैसा कि हज़रत उम्मे सलमा-अल्लाह उनसे प्रसन्न रहे-से कथित है उन्होंने कहा कि हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-उनके पास तीन दिन रहे थे और उनसे कहा था :यदि तुम चाहो तो तुम्हारे पास सात दिन रहूँ और फिर उनके साथ भी सात सात दिन रहूँगा, और अगर चाहो तो तुम्हारे पास तीन दिन रहूँ और चक्कर लगाऊं तो उन्होंने कहा तीन दिन रहिए l
यह हदीस हज़रत अबू-बक्र बिन अब्दुर-रहमान से कथित है , और सही है इसे इमाम बुखारी ने 'तारीख कबीर'में उल्लेख किया, देखिए पेज नंबर या संख्या:१/४७
४- हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-तो इतना ज़ियादा इनसाफ का ख्याल रखते थे कि अपने अंतिम दिनों के दौरान भी अपनी पत्नियों पर ज़ुल्म नहीं होने दिए , और उस समय भी वह अपनी पत्नियों में से प्रत्येक के यहाँ बारी के अनुसार जाते रहे lहज़रत आइशा-अल्लाह उनसे प्रसन्न रहे- कहती हैं :"जब हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-बहुत बीमार हो गए थे तो अपनी पत्नियों से मेरे घर में रहने की अनुमति मांगी तो उनकी पत्नियों ने अनुमति दे दी, इसके बाद वह दो आदमियों के बीच सहारा लेकर चले और उनके पैर ज़मीन पर घिसट रहे थे वह हज़रत अब्बास और एक किसी आदमी के बीच में चल रहे थे, उबैदुल्लाह-जो इस हादीस के कथावाचक हैं-ने कहा :मैंने इब्ने अब्बास से हज़रत आइशा-अल्लाह उनसे प्रसन्न रहे- के कथन का उल्लेख किया तो उन्होंने कहा क्या तुम जानते हो कि वह आदमी कौन हैं जिनका नाम हज़रत आइशा-अल्लाह उनसे प्रसन्न रहे- ने छोड़ दिया मैंने कहा :नहीं तो उन्होंने कहा :वह हज़रत अली बिन अबी तालिब थे l"
यह हदीस हज़रत आइशा-अल्लाह उनसे प्रसन्न रहे-के द्वारा कथित की गई , और यह हदीस सही है, इसे इमाम बुखारी ने उल्लेख किया है, देखिए बुखारी शरीफ पेज नंबर या संख्या: २५८८l
५- एक दूसरे कथन में उल्लेख है हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-अपने अंतिम दिनों में और जिस बीमारी में उनका निधन हुआ उस समय पूछते थे और कहते थे "कल मेरी बारी कहाँ है?" "कल मेरी बारी कहाँ है?" मतलब हज़रत आइशा-अल्लाह उनसे प्रसन्न रहे- की बारी कब है? तो उनकी पत्नियों ने उन्हें अनुमति दे दी कि जहां चाहें रहें तो वह हज़रत आइशा-अल्लाह उनसे प्रसन्न रहे- के यहां रहते थे यहां तक कि उन्हीं के यहां उनका निधन हुआlहज़रत आइशा-अल्लाह उनसे प्रसन्न रहे- कहती हैं :" तो उनका निधन मेरे यहां उस दिन हुआ जिस दिन मेरी बारी थी , अल्लाह सर्वशक्तिमान ने उन्हें उठा लिया जब उनका सिर मेरे गोद में था और उनके मुंह का पानी मेरे मुंह के पानी से मिला था फिर वह कहती हैं : अब्दुररहमान बिन अबू-बक्र आए उनके हाथ में एक मिस्वाक था जो मिस्वाक करने के लिए रखे थे तो हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-ने उनको देखा तो मैं उसे बोली ऐ अब्दुर्रहमान! यह मिस्वाक इन्हें दे दो तो उसने मुझे दिया तो मैं उसे चबाई और उसे दांतों से नरम की फिर उसे हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-को दी तो वह उससे मिस्वाक किए और वह मेरे सीने से टेका लिए हुए थे l"
यह हदीस हज़रत आइशा-अल्लाह उनसे प्रसन्न रहे-के द्वारा कथित की गई , और यह हदीस सही है, इसे इमाम बुखारी ने उल्लेख किया है, देखिए बुखारी शरीफ पेज नंबर या संख्या: ४४५०l
६-हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-अपनी पत्नियों के बीच जहां तक हो सकता था बहुत इनसाफ करते थे और इनसाफ का पूरा पूरा ख्याल रखने के बावजूद भी अल्लाह से माफ़ी मांगते थे अगर उनसे कुछ कमी रह जाती थी जो उनके बस से बाहर था और जो नहीं कर सकते थे तो भ अल्लाह से माफ़ी मांगते थेlइस विषय में हज़रत आइशा-अल्लाह उनसे प्रसन्न रहे- कहती हैं कि हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-अपनी पत्नियों के बीच इनसाफ करते थे और बारी रखते और फिर यह दुआ करते थे:" ऐ अल्लाह यह मैं इनसाफ करता हूँ जो मेरे बस में है और उस बात पर मुझे दोषी मत रख जो तेरे बस में तो है लेकिन मेरे बस में नहीं है l"
यह हदीस हज़रत आइशा-अल्लाह उनसे प्रसन्न रहे-के द्वारा कथित की गई , इस हदीस को हम्माद बिन ज़ैद ने अबू-अय्यूब से किलाबा से "मुरसल" रूप से कथित किया है l"मुरसल" ऐसी हदीस को कहते हैं जिनको किसी 'ताबई' सहाबी को छोड़ कर सीधा हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-से कथित कर दें lइसे इमाम बुखारी ने उल्लेख किया है, देखिए 'इलल कबीर' पेज नंबर या संख्या: १६५l
इसका मतलब यह है कि जिसका संबंध दिल की भावना से है वह तो मेरे बस में नहीं है , और यह बात अबू-दावूद ने कही है, और यह भी कहा गया है कि इसका मतलब दिल का झुकाव और प्यार है जैसा कि इमाम तिरमिज़ी ने उल्लेख किया इस का अर्थ यह है कि बाहरी बारी में तो वह पूरा पूरा ख्याल रखते थे क्योंकि यह बात उनके बस में थी लेकिन दिल तो अल्लाह सर्वशक्तिमान के हाथ में है और उनकी दिल की भावना तो हज़रत आइशा-अल्लाह उनसे प्रसन्न रहे- की तरफ ज़ियाद थी और यह तो उनके बस और इरादे से बाहर थी l
इस के बावजूद भी वह अल्लाह सर्वशक्तिमान से दुआ करते थे कि जो बात उनके बस और क़ाबू में नहीं है उस पर पकड़ न करे और दिल की भावना में तो इनसाफ करने का आदमी को आदेश भी नहीं है, हाँ ख़र्च में और बारी में इनसाफ करने का आदेश है, लेकिन फिर भी हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-इस लिए दुआ करते थे कि मोमिन का दिल सदा अल्लाह से डर कर रहता है, जैसा कि अल्लाह सर्वशक्तिमान का फरमान है:
(और जो लोग देते हैं, जो कुछ देते हैं और हाल यह होता है कि दिल उनके काँप रहे होते हैं, इसलिए कि उन्हें अपने रब की ओर पलटना हैl)
एक दूसरी हदीस में जो आया है उससे पता चलता है कि पत्नियों के बीच न्याय एक गंभीर बात है lहज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-ने कहा है :" जिसकी दो पत्नियां हो और किसी एक की ओर ज़ियादा झुकाव रखता हो तो क़ियामत के दिन जब वह आएगा तो उसका एक पहलू झुका हुआ होगा l"
इस हदीस को अबू-हुरैरा ने कथित किया और यह हादीस ठीक है इसे इब्ने अदी ने उल्लेख किया है , देखिए 'अलकामिल फीद-दुअफाअ'पेज नंबर या संख्या: ८/४४६l
वास्तव में हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-के अपनी पत्नियों के साथ इनसाफ करने में वफादार विश्वासियों के लिए सबसे अच्छा उदाहरण हैlमुसलमानों को चाहिए कि वे इसका ज्ञान प्राप्त करें और उस पर चलें क्योंकि अल्लाह सर्वशक्तिमान का फरमान है:
(निस्संदेह तुम्हारे लिए अल्लाह के रसूल में एक उत्तम आदर्श है अथार्त उस व्यक्ति के लिए जो अल्लाह और अंतिम दिन की आशा रखता हो और अल्लाह को अधिक याद करेl)
सही बात यह है कि उनके किरदार उनकी बात और उनकी स्वीकृति उनके मानने वालों के लिए क़ानून है और उस में उनके लिए मार्गदर्शन है और सारे लोगों पर उसके अनुसार अमल करना ज़रूरी है यदि वह आदेश हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-के साथ विशेष न हो l